इंटरनेट क्या है? – पूरी जानकारी

इंटरनेट क्या होता है - What is an internet in Hindi

इंटरनेट का इस्तेमाल तो हम रोजाना करते है। कुछ भी हमे चाहिए होता है तो इंटरनेट की मदद से वो आसानी है मिल जाता है।

रोजमर्रा की इस जिंदगी में अपने मोबाइल, लैपटॉप, कंप्यूटर या अन्य किसी डिवाइस पर इंटरनेट का इस्तेमाल हम सब करते ही है। घर बैठे ही बस कुछ बटन दबाते ही आपको जो चाहिए होता है आसानी से इंटरनेट उसे आपके सामने ले आता है।

आज की डेट में हम 3 घंटे बिना खाए पिए तो रह सकते है लेकिन बिना इंटरनेट के 30 मिनट भी निकाल पाना बहुत मुश्किल है। इसीलिए अब इंटरनेट हमारी जरुरत के साथ साथ अब हमारी आदत भी बन चुका है।

लेकिन क्या अपने कभी सोचा है की, इंटरनेट आता कहाँ से है? इसका मालिक कौन है?

आइए आगे बढ़ते है और इंटरनेट के बारे में विस्तार से जानते है।

विषय - सूची

इंटरनेट क्या है?

संक्षेप में कहुँ तो, इंटरनेट एक विशाल नेटवर्क है जो पूरी दुनिया में कंप्यूटर और मोबाइल को जोड़ता है। इंटरनेट के माध्यम से, लोग कहीं से भी, किसी के भी साथ बातचीत और जानकारी शेयर कर सकते हैं।

इंटरनेट या अंतरजाल दुनिया भर में आपस में जुड़ा हुआ कंप्यूटर नेटवर्क और उपकरणों के बीच बातचीत करने का माध्यम है, जो आपस में संचार करने के लिए इंटरनेट प्रोटोकॉल सूट (TCP/IP) का उपयोग करता है।

यह कई नेटवर्कों का नेटवर्क है जिसमे लोकल से ले कर वैश्विक क्षेत्र तक प्राइवेट, पब्लिक, अकेडमिक, बिज़नेस और गवर्नमेंट नेटवर्क शामिल है, जो इलेक्ट्रॉनिक, वायरलेस और ऑप्टिकल नेटवर्किंग तकनीकों के एक विशाल क्षेत्र से जुड़ा हुआ है।

इंटरनेट जानकारी संसाधन और सेवाओं का एक विशाल क्षेत्र है, जैसे की इंटर-लिंक्ड हाइपरटेक्स्ट डॉक्यूमेंट और वर्ल्ड वाइड वेब (WWW) की एप्लीकेशन, इलेक्ट्रॉनिक मेल (इ-मेल), ऑडियो और वीडियो ट्रांसमिशन, टेलीफोनी और फ़ाइल शेयरिंग।

1970 के दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका में इंटरनेट की सुरुवात हुई, लेकिन 1990 के दशक की शुरुआत तक यह आम लोगो के लिए उपलब्ध नहीं था। 2020 तक, लगभग 4.5 बिलियन लोग, या दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी, इंटरनेट का इस्तेमाल कर रही है।

इंटरनेट का इतिहास

इंटरनेट का इतिहास - History of Internet

60s के दशक में कंप्यूटर काफी बड़े और स्थिर होते थे और किसी एक कंप्यूटर में स्टोर जानकारी का उपयोग करने के लिए, एक कंप्यूटर की साइट से दूसरे कंप्यूटर तक जाना होता था या मैग्नेटिक कंप्यूटर टेप को नार्मल डाक के माध्यम से भेजा जाता था।

1960 के दशक में, संयुक्त राज्य अमेरिका के रक्षा विभाग ने जानकारी शेयर करने के लिए इसको बनाया था। शुरुवात में इसका का नाम ARPANET (Advanced Research Projects Agency Network) रखा गया था।

ARPANET एक बड़ी सफलता थी, लेकिन वो कुछ एकेडमिक और रिसर्च आर्गेनाइजेशनो तक ही सीमित थी, जिनका रक्षा विभाग के साथ कॉन्ट्रैक्ट था। इसके लिए, जानकारी शेयर करने के लिए अन्य नेटवर्क बनाए गए थे। 1990 में ARPANET के स्थान पर इंटरनेट का विकास हुआ।

1970 में, नेटवर्किंग टूल्स तैयार किये गए। 1972 में, NCSA (National Center for Supercomputing Applications) ने रिमोट लॉगिन (जिससे किसी भी कंप्यूटर को आपस में जोड़ा जा सके) के लिए Telnet एप्लीकेशन बनाई। 1973 में, फाइलो के ट्रांसफर के लिए एक FTP (File Transfer Protocol) बनाया।

1971 में कंप्यूटर की मात्रा बढ़ने लगी, जिसके कारण ARPANET 10000 कंप्यूटरो का एक नेटवर्क बना। बाद में, 1987 – 1989 के बीच में इसमें 100,000 कंप्यूटर शामिल हुए।

जनवरी 1983 में, आधिकारिक तौर पर इंटरनेट की घोषणा की गई थी। तब एक नया संचार प्रोटोकॉल स्थापित किया गया था जिसे Transfer Control Protocol / Internet Protocol (TCP/IP) कहा जाता है। इसके जरिये कई प्रकार के कंप्यूटर अलग अलग नेटवर्क पर एक दूसरे के साथ आसानी से “बात” कर पाते है। इसलिए इंटरनेट का जन्म हुआ और अब सभी नेटवर्क एक यूनिवर्सल लैंगुएज से जुड़े रह सकते हैं।

1990 में, ARPANET को बंद कर दिया गया था। 1993 में, CERN (European Center for Nuclear Research) Switzerland (Geneva), के वैज्ञानिक Tim Berner Lee ने वर्ल्ड वाइड वेब (WWW) को विकसित किया। WWW इन्‍टरनेट पर सूचनाओं को व्यवस्थित करने, दिखाने और एक्‍सेस करने के लिए HTTP (हाइपरटेक्स्ट ट्रांसफर प्रोटोकॉल) और हाइपरलिंक का उपयोग करता है।

1993 – 1994 में, Mosaic और Netscape Navigator जैसे ग्राफिकल वेब ब्राउजर मार्केट में आये और इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ने लगा। इन ब्राउजर की ग्राफिक क्षमता के कारण WWW और इंटरनेट अब आम आदमी तक और आसानी से पहुंच सका।

भारत में इंटरनेट की शुरुआत 1986 में हुई और यह केवल शैक्षिक और अनुसंधान समुदाय के लिए उपलब्ध था। यह सार्वजनिक रूप से 15 अगस्त 1995 से उपलब्ध हुआ था।

ARPANET का इतिहास

ARPANET (Advanced Research Projects Agency Network) संयुक्त राज्य अमेरिका के रक्षा विभाग के Advanced Research Projects Agency of America (ARPA) द्वारा बनाया गया अनुसंधान नेटवर्क था, जो इंटरनेट का जन्मदाता था।

इस की शुरुआत 1966 में Robert Taylor ने की थी, जो प्रमुख विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं के बीच जानकारी शेयर करना चाहते थे।

शुरुआत में ये नेटवर्क अमेरिका की तीन यूनिवर्सिटी के (कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, स्टैनफोर्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट और यूटा विश्वविद्यालय) बीच तीनो होस्ट कम्‍प्‍यूटर को आपस में जोड़कर बनाया गया था जिसके द्वारा यूजर जानकारी का आदान-प्रदान करते थे।

1972 में, तब ARPANET से लगभग 32 होस्ट कम्‍प्‍यूटर ओर जुड़ चुके थे और इसी साल ARPA का नाम DARPA (Defence Advanced Research Projects Agency) में बदल दिया गया।

1973 में, ARPANET ने अमेरिका के बहार पहला इंटरनेशनल कनेक्शन इंग्लैंण्‍ड और नार्वे में किया था।

ARPANET का एक मुख्य उद्देश्य यह था कि नेटवर्क का कोई एक भाग यदि काम करना बंद कर दे तब भी नेटवर्क चालू रहे। इस क्षेत्र में जो प्रगति हुई वह नेटवर्किंग रूल्‍स और प्रोटोकाल्स की वजह से, जिसे TCP/IP (Transmission Control Protocol/Internet Protocol) के नाम से जानते है।

TCP/IP, प्रोटोकॉल्स का ए‍क समूह होता है जो यह बताता है कि नेटवर्क में डेटा किस तरह से ट्रांसफर होगा या एक डिवाइस से दूसरे डिवाइस में डाटा कैसे ट्रांसफर होगा।

ARPANET, नेटवर्क में “बे‍कबोन” के रूप में काम करता था, यह छोटे-छोटे से लोकल नेटवर्क को आपस में जोड़ता है और जब सभी छोटे-छोटे नेटवर्क बेकबोन से जुड़ जाते हैं तब वे आपस में भी डाटा का आदान-प्रदान कर सकते हैं।

1983 में DARPA नें यह तय किया कि ARPANET से जुड़ने वाले कंप्यूटरो के लिए TCP/IP एक स्‍टेंडर्ड प्रोटोकॉल सेट होगा।

अगर कोई भी नेटवर्क ARPANET से जुड़ना चाहता था, तो उसे TCP/IP का उपयोग करना होता था, जो की मुफ्त में उपलब्ध था और लगभग सभी नेटवर्क इसका उपयोग भी करते थे।

TCP/IP प्रोटोकॉल्‍स के विस्तार के कारण आज के इंटरनेट का स्वरूप सामने आया है। जिसे हम “Network of Networks” भी कहते हैं।

इंटरनेट कैसे काम करता है?

इंटरनेट कैसे काम करता है?

अब तक अपने इंटरनेट के विकास और इतिहास के बारे में जाना, आइए जानते है की “इंटरनेट कैसे काम करता है?”

इंटरनेट दुनिया भर के कंप्यूटरो का एक नेटवर्क है, जो कई तरह के डेटा को आपस में जुड़े हुए डिवाइस के माध्यम से भेजता है। यह पैकेट रूटिंग नेटवर्क का उपयोग करता है जो Internet Protocol (IP) और Transport Control Protocol (TCP) के जरिये काम करता है।

TCP और IP, दोनों एक साथ काम करते हैं और यह सुनिश्चित करते है की इंटरनेट पर डेटा ट्रांसमिशन लगातार और सही तरीके से हो रहा है। यह सुनिश्चित करने में मदद करता है कि कोई पैकेट छूट तो नहीं गया, और सभी पैकेट को सही क्रम में फिर से जोड़ा जाए।

जब इंटरनेट पर डेटा ट्रांसफर होता है, तो वह मैसेज और पैकेट के रूप में होता है। इंटरनेट पर भेजे गए डेटा को मैसेज कहा जाता है, लेकिन मैसेज भेजे जाने से पहले, वे छोटे भागों में टूट जाता हैं जिसे पैकेट कहा जाता है।

ये मैसेज और पैकेट Internet Protocol (IP) और Transport Control Protocol (TCP) का उपयोग करके एक स्रोत से दूसरे स्रोत तक जाते हैं। IP एड्रेस (हर उस डिवाइस और कंप्यूटर का होता है जो इंटरनेट से जुड़ा होता है), कंप्यूटर एड्रेस होता है जो यह बताता है कि एक इंटरनेट कनेक्शन पर एक कंप्यूटर से दूसरे कंप्यूटर तक सूचना कैसे भेजी जाए।

सोच रहे है कि ब्राउज़र पर सर्च रिजल्ट और इंटरनेट कैसे काम करता है? चलो चरण-दर-चरण प्रक्रिया पर चलते हैं।

जब आप अपने ब्राउज़र पर वेब एड्रेस को टाइप करते हैं:

आपका कंप्यूटर या डिवाइस मोडम या राउटर के माध्यम से वेब (इंटरनेट) से जुड़ा होता है। साथ में, ये डिवाइस आपको दुनिया भर के अन्य नेटवर्क से जोड़ कर रखते है।

आपका राउटर कई कंप्यूटरों को एक ही नेटवर्क से जोड़ता है जबकि एक मोडम आपके ISP (इंटरनेट सेवा प्रदाता) से जोड़ता है जो आपको केबल या DSL इंटरनेट प्रदान करता है।

वेब एड्रेस, जिसे URL (यूनिफ़ॉर्म रिसोर्स लोकेटर) के रूप में जाना जाता है। हर एक वेबसाइट का अपना यूनिक URL होता है जो आपके ISP को संकेत देता है कि आप कौन सी वेबसइट का इस्तेमाल करना चाहते हैं।

उसके बाद, आपकी सर्च की गई query को आपके ISP को भेजा जाता है, जो कई सर्वरों से जुड़ा होता है, जो एक NAP सर्वर (नेटवर्क एक्सेस प्रोटेक्शन) और एक DNS (डोमेन नाम सर्वर) की तरह डेटा स्टोर करता हैं और भेजता हैं।

उसके बाद, आपका ब्राउज़र DNS के माध्यम से सर्च इंजन में टाइप किए गए डोमेन नेम के IP एड्रेस को ढूंढ़ता है। DNS तब आपके द्वारा टाइप किए गए टेक्स्ट-आधारित डोमेन नाम को ब्राउज़र में नंबर-आधारित IP एड्रेस में ट्रांसलेट करता है।

उदाहरण: www.google.com को 64.233.191.255 में बदल दिया जाता है।

आपका ब्राउज़र Hypertext Transfer Protocol (HTTP) Request को टारगेट सर्वर को भेजता है ताकि TCP/IP का उपयोग करके क्लाइंट को वेबसाइट की एक कॉपी दी जा सके।

सर्वर तब रिक़ुएस्ट को स्वीकार करता है और आपके कंप्यूटर पर “200 OK” मैसेज भेजता है। फिर, सर्वर वेबसाइट की फाइलो को ब्राउज़र तक भेजता है जो की को डेटा पैकेट के रूप मे होती है।

जैसे ही आपका ब्राउज़र सभी डेटा पैकेटों को फिर एक साथ जोड़ देता है, तब वेबसाइट काम में लेने के लिए तैयार हो जाती है। ये सारा प्रोसेस मिली-सेकंड में होता है।

इंटरनेट का मालिक कौन है और कहा से आता है?

इंटरनेट का मालिक कौन है और कहा से आता है

इंटरनेट का कोई मालिक नहीं है। ये पूरी तरह से मुफ्त है और इसे कोई भी इस्तेमाल कर सकता है। 

इंडिया को मिला के पूरी दुनिया इंटरनेट से जुडी हुई है लेकिन आपने कभी ये नहीं सोचा होगा की ये काम कैसे करता है या फिर आप तक कैसे पहुँचता है।

आपको लगता होगा की इंटरनेट शायद सेटेलाइट से चलता है या शायद पूरी दुनिया में इंटरनेट का कोई जल बिछा कर रखा होगा। लेकिन 99% इंटरनेट फाइबर ऑप्टिक केबल से चलता है।

अब आप सोच रहे होंगे की मैं तो इंटरनेट मोबाइल में चलाता हूँ और मोबाइल में तो कोई केबल नहीं होती है। जिस भी टावर से आपके मोबाइल को नेटवर्क मिलता है, वो टावर फाइबर ऑप्टिक केबल से जुड़ा होता है।

वैसे तो इंटरनेट फ्री है। अगर आप किसी दो कंप्यूटर को आपस में कनेक्ट करके डाटा का आदान प्रदान करते है तो वो इंटरनेट कहलाता है। इसमें आपका जो पैसा लगा वो केवल उस केबल का लगा जिसके जरिये अपने दोनों कंप्यूटर को जोड़ा हुआ है।

ठीक उसी तरह से इंटरनेट कंपनियों ने भी अपनी फाइबर ऑप्टिक केबल को समुद्र के अंदर बिछा दी और सभी देशों को आपस में उससे जोड़ दिया। Submarine Cable Map के जरिये यह पता चल जाएगा की पूरी दुनिया में कहाँ पर कितनी केबल बिछी हुई है। ये बिलकुल गूगल के मैप की तरह ही दिखता है।

जिन कंपनियों ने ये केबल बिछाई है और इस पर खर्चा किया है, उन्हें टियर 1 कंपनी कहते है। जैसा की केवल समुद्र के अंदर है तो कुछ टूट जाती है, शार्क काट देती है या और कोई समस्या आ जाती है।

इसके लिए इन्हे बैकअप चाहिए होता है तो उसके लिए भी एक्स्ट्रा केबल ये पहले से ही बिछा के रखते है। जब केबल में समस्या आ जाती है तो ये उस केबल का ट्रैफिक या नेटवर्क किसी दूसरी केबल पर ट्रासंफर कर देते है। जिससे आपकी इंटरनेट की स्पीड थोड़ी धीमी हो जाती है, लेकिन इंटरनेट फिर भी चलता रहता है।

मन लीजिये की अगर आप गूगल की वेबसाइट को एक्सेस कर रहे है तो आपका नेटवर्क डायरेक्ट मुंबई से हो कर जा रहा है जिससे आपको इंटरनेट की स्पीड काफी अच्छी मिल रही है। अगर वही घूम कर के चेन्नई से हो कर जाए तो इसमें काफी समय लगेगा जिसकी वजह से आपका इंटरनेट थोड़ा से धीमा हो जाएगा।

इंटरनेट धीमा क्यों चलता है?

इंटरनेट धीमा क्यों चलता है - Internet Speed

इसके कई कारण हो सकते है। आइये कुछ सामान्य कारणों के बारे भी जान लेते है।

पहला कारण:

जैसा की मेने  ऊपर बताया है, जब इन कंपनियों की फाइबर ऑप्टिक केबल टूट जाती है या उसमे कोई और समस्या आ जाती है। तब ये उस केबल का ट्रैफिक दूसरी केबल पर ट्रासंफर कर देते है जब तक ही वो केबल ठीक न हो जाए।

अगर आप सीधा जाते है तो जल्दी पहुंचेंगे और अगर वही घूम कर जाते है तो पहुंचने में समय लगता है। उसी तरह से जब आपका इंटरनेट दूसरी केबल पर ट्रांसफर कर दिया ज्यादा है तो इंटरनेट थोड़ा सा धीमा हो जाता है। 

दूसरा कारण:

मान लीजिए की आपके पास JIO का इंटरनेट कनेक्शन है और आपके एरिया में 100MB की स्पीड आती है और बाकि के पास भी JIO का ही कनेक्शन है।

अब एक साथ अगर 10 लोग JIO के इंटरनेट का इस्तेमाल करेंगे तो ये 100MB की स्पीड उन दस लोगो में बंट जाएगी। तब हर एक को 10MB की स्पीड ही मिल पाएगी। जिससे आपका इंटरनेट धीमा चलेगा। 

अगर एक समय में 2 ही लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे होंगे तो स्पीड उन दोनों में बराबर  बंट जाएगी। तब आपको स्पीड 50MB की मिलेगी।

जितने कम लोग या कम डिवाइस इंटरनेट का इस्तेमाल करेंगे उतनी ही ज्यादा स्पीड मिलेगी।

तीसरा कारण:

कई बार इंटरनेट की स्पीड आपके डिवाइस पर भी निर्भर करती है। आपके मोबाइल या कंप्यूटर का WIFI या LAN कितनी स्पीड को संभल सकता है ये भी एक कारण हो सकता है।

आपको शायद यह नहीं पता होगा की आपके WIFI, LAN, मोडम, राउटर या हर वो डिवाइस जो इंटरनेट से जुड़ा होता है उसकी एक लिमिट होती है। सब की अलग अलग लिमिट होती है जैसे की कोई 50MB, 100MB, 400MB या उससे ज्यादा तक इंटरनेट को संभल सकता है।

चौथा कारण:

अगर किसी एक वेबसाइट पर इंटरनेट धीमा चल रहा है और बाकि सब वेबसाइट पर सही से काम कर रहा है तो यह हो सकता है की उस वेबसाइट के सर्वर में कोई समस्या आ रही होगी जिसकी वजह से वो आपको अपनी सर्विस ठीक से नहीं दे पा रहा है।

अगर अगली बार इंटरनेट की स्पीड कम आए तो इन बिंदुओं के बारे में जरूर सोचिए गा।

इंटरनेट सेवा प्रदाता हमसे पैसे क्यों लेते है?

इंटरनेट सेवा प्रदाता जो फाइबर ऑप्टिक केबल समुद्र में बिछाता है उसके रखरखाव और अपने कर्मचारियों को जो तनख्वा ये देते है उसके लिए ये आप से पैसे लेते है।

इसमें भी तीन तरह की इंटरनेट कम्पनियाँ होती है, टियर 1, टियर 2 और टियर 3।

टियर 1: इसमें बड़ी कम्पनियाँ आती है जो अपना खुद का इंफ्रास्ट्रक्चर और केबल बिछाती है समुद्र में। इनका बस एक बार का ही खर्चा होता है। जैसे की JIO, Airtel, VI इत्यादि है।

टियर 2: इनमे वो कम्पनियाँ आती है जो टियर 1 से इंटरनेट खरीदती है और फिर पुरे देश में सप्लाई करती है। जाहिर सी बात है अगर ये टियर 1 से इंटरनेट खरीदेगी तो आपको इनके प्लान्स थोड़े से हाई देखने को मिलेंगे।

टियर 3: इसमें वो कम्पनियाँ आती है जो टियर 1 या टियर 2 से इंटरनेट खरीदती है और पुरे राज्य या सिटी में इंटरनेट सर्विस देती है। जैसे की तिकोना, Hatway इत्यादि। अब अगर ये भी किसी से इंटरनेट खरीदते है तो ये भी प्लान्स की कीमते भी ज्यादा ही होंगी।

इसी लिए ये कम्पनियाँ इंटरनेट सर्विस के बदले आपसे पैसे लेती है। ताकि वे अपने इंफ्रास्ट्रक्चर और केबल का रखरखाव अच्छे से कर सके।

इंटरनेट, इंट्रानेट और एक्स्ट्रानेट में क्या अंतर है?

इंटरनेट, इंट्रानेट और एक्स्ट्रानेट में क्या अंतर है - Difference Between Internet, Intranet and Extranet

इंटरनेट, इंट्रानेट और एक्स्ट्रानेट का उपयोग आमतौर पर व्यापार के लेन देन में किया जाता है; हालाँकि अभी भी इनके बीच का अंतर कई लोगो को नहीं पता है।

इंटरनेट

इंटरनेट दुनिया भर में एक साथ लाखों कंप्यूटरों का आपस में जुड़ा हुआ एक नेटवर्क है जिसमें कोई भी कंप्यूटर किसी भी अन्य कंप्यूटर के साथ संचार कर सकता है। इसका कोई सर्वर नहीं होता है जो इंटरनेट को कंट्रोल करता हो।

यह एक जाल है नेटवर्क डिवाइसो का जैसे कि राउटर, कंप्यूटर, रिपीटर्स, सैटेलाइट, वाईफाई, सर्वर आदि जो लगातार डेटा लाइनों और वायरलेस सिगनल के माध्यम से संचार करते है।

वास्तव में इंटरनेट का कोई भी मालिक नहीं है, और कोई भी व्यक्ति या संगठन इंटरनेट को पूरी तरह से कंट्रोल नहीं कर सकता है।

इंटरनेट एक आईडिया है जिसे छुआ नहीं जा सकता है और यह एक फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर है जो कई दूसरे नेटवर्क से जुड़ा होता है। 

कोई भी इंटरनेट से जुड़े डिवाइस का उपयोग करके इंटरनेट का इस्तेमाल कर सकता है, जैसे कि डेस्कटॉप कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल फोन या टैबलेट।

अगर आप दुनिया भर में लोगों के एक बड़े ग्रुप के साथ जानकारी शेयर करना चाहते हैं तो इंटरनेट सबसे आसान विकल्प होता है। आप सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी शेयर कर सकते हो, एक वेबसाइट बना सकते हो या एक ईमेल भेज सकते हो।

इंटरनेट संचार के लिए TCP/IP प्रोटोकॉल का उपयोग करता है। हर एक डिवाइस का अपना एक यूनिक IP एड्रेस होता है। डोमेन नेम सर्वर (DNS) का उपयोग करके IP एड्रेस को एक नाम दिया जाता है। इसलिए उपयोगकर्ताओं के लिए संख्याओं के बजाय नामों को याद रखना आसान हो जाता है।

इंट्रानेट

इंट्रानेट एक प्राइवेट कंप्यूटर नेटवर्क है। जिसका इस्तेमाल प्राइवेट और सरकारी  कंपनियों में किया जाता है।

कंपनी अपनी जानकारी और कंप्यूटिंग रिसोर्सेस को अपने कर्मचारियों के साथ सुरक्षित रूप से शेयर करने के लिए इसका इस्तेमाल करती है। इसके लिए इंटरनेट प्रोटोकॉल और नेटवर्क कनेक्टिविटी का उपयोग किया जाता है।

इंट्रानेट एक आर्गेनाइजेशन के अंदर अपने कर्मचारियों को किसी भी तरह की जानकारी, लिंक, एप्लिकेशन, फॉर्म या डेटाबेस का एक्सेस देने के लिए किया जाता है, जिसकी इजाज़त उस कंपनी के एडमिन के द्वारा दी जाती है।

इंटरनेट के जरिये केवल उस कंपनी का कर्मचारी ही कंपनी की अंदरुनी जानकारी को देख और एक्सेस कर सकता है। उस कंपनी के स्टाफ के अलावा कोई उसे न ही देख सकता है और नहीं एक्सेस कर सकता है।

हर कर्मचारी को कंपनी द्वारा username और password दिया जाता है जिसके जरिये वो कंपनी के इंट्रानेट का इस्तेमाल कर सकता है। ज्यादातर इंट्रानेट की सुविधा का इस्तेमाल ग्रुप और टेलीकांफ्रेंसिंग के लिए किया जाता है।

इंटरनेट की तरह, इंट्रानेट भी संचार के लिए TCP/IP प्रोटोकॉल का इस्तेमाल करता है। इंट्रानेट में भी वेब ब्राउज़र के माध्यम से जानकारी और फाइल को शेयर कर सकते है। हालाँकि, केवल इंट्रानेट से जुड़े कंप्यूटर ही इंटरनल फाइल और वेब पेज को देख सकते हैं।

एक्स्ट्रानेट

एक्स्ट्रानेट भी इंट्रानेट की तरह ही होता है। कई बार कंपनी के इंट्रानेट का इस्तमाल कंपनी के बाहर से करना पड़ जाता है। कई बार कंपनी अपने ग्राहकों, पार्टनर्स, विक्रेताओं, सप्लायरस और दूसरे व्यवसायों को अपने इंट्रानेट को एक्सेस करने की अनुमति देती है। जब कंपनी के नेटवर्क को कंपनी के बाहर से एक्सेस किया जाता है तो उसे ही एक्स्ट्रानेट कहते है।

अक्सर इसका इस्तेमाल किसी विशिष्ट कंपनी या एजुकेशनल इंस्टीटूशन द्वारा किया जाता है और इसके लिए भी पूरे नेटवर्क का एक्सेस दिए बिना कर सकते है। एक्स्ट्रानेट अक्सर एक वेबसाइट का एक निजी हिस्सा होता है। यह एक लॉगिन पेज पर user ID और password के दाल करके इसका इस्तेमाल किया जाता है।

इंटरनेट कनेक्शन के प्रकार

इंटरनेट कनेक्शन के प्रकार​ - Internet Connection

जब से इंटरनेट का आविष्कार हुआ है तब से लेकर अब तक कई तरह के इंटरनेट कनेक्शन हुए है, जिससे आप अपने डिवाइस को इंटरनेट से जोड़ सकते हो।

सभी कनेक्शन अलग अलग हार्डवेयर का इस्तेमाल करते हैं और हर एक कनेक्शन के जरिये आपको इंटरनेट स्पीड अलग अलग मिलती है।

समय के साथ तकनीक में भी बदलाव आ रहे हैं और उसी के साथ हमे फ़ास्ट इंटरनेट की जरुरत पड़ रही है। आइए थोड़ इंटरनेट कनेक्शन और कौन सा इंटरनेट कनेक्शन हमे कितनी स्पीड देता है, ये भी जानते है।

1. Dial-Up Connection

Dial-up Connection सबसे शुरुआती इंटरनेट कनेक्शन होते है। इसमें एक टेलीफ़ोन लाइन होती है जिससे कई सारे यूज़र जुड़े होते है और वो आपके कंप्यूटर से जुडी होती है जिससे आप इंटरनेट एक्सेस कर पाते है।

Dial-Up Connection सबसे सस्ता कनेक्शन होता है लेकिन साथ ही साथ ये आपको इंटरनेट स्पीड भी उतनी ही स्लो देता है। इसमें एक मोडम होता है जो इंटरनेट से जुड़ा होता है और आपका कंप्यूटर एक फ़ोन नंबर डायल करता है, जो आपको ISP (इंटरनेट सेवा प्रदाता) देता है और तब आप इंटरनेट से कनेक्ट हो पाते है।

इसमें मोडम, एनालॉग सिगनल (analog signal) को डिजिटल सिगनल में बदल देता है और फिर उसे ISP को भेजा जाता है टेलीफ़ोन लाइन के द्वारा। इसीलिए इसमें इंटरनेट की स्पीड 26KB से 56KB तक की होती है।

इस तरह के कनेक्शन में कंप्यूटर और टेलीफ़ोन दोनों ही एक ही लाइन का इस्तेमाल कर रहे होते है तो इसलिए दोनों को एक साथ इस्तेमाल कर पाना संभव नहीं होता था। इसीलिए अगर आप इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे होते है तो टेलीफ़ोन लाइन बिजी बता है और जब आप टेलीफ़ोन पर किसी से बात कर रहे होते है तो इंटरनेट कनेक्ट नहीं हो पता है।

2. DSL Connection

DSL (Digital Subscriber Line) इंटरनेट कनेक्शन में दो तरफ़ा होता है, इसमें टेलीफ़ोन और इंटरनेट दोनों का इस्तेमाल एक साथ कर सकते है।

DSL एक वायर कनेक्शन होता है जो डाटा को कॉपर टेलीफ़ोन लाइन के माध्यम से भेजता है। इसमें उन टेलीफ़ोन कनेक्शन का इस्तेमाल किया जाता है जो पहले से ही घर या ऑफिस में लगे होते है।

इसे Dial-Up Connection का अपडेट वर्जन भी कह सकते है। इसमें Dial-Up Connection की तरह नंबर डायल करने की जरुरत नहीं होती है इंटरनेट कनेक्ट करने के लिए।

DSL डाटा को भेजने और रिसीव करने के लिए राऊटर का इस्तेमाल करता है। इसकी इंटरनेट स्पीड 128KB से लेकर 8MB तक हो सकती है जो की आपके ISP पर निर्भर करती है।

इसकी स्पीड और उपलब्धता आपके घर या ऑफिस टेलीफ़ोन कंपनी से कितनी दूर है इस पर निर्भर करती है।

3. Cable Internet Connection

Cable Internet Connection केबल टीवी ऑपरेटर द्वारा दिया जाता है।

DSL और Dial-Up Connection के मुकाबले इसमें इंटरनेट स्पीड काफी अच्छी मिलती है। जो की 512KB से हो कर 20MB तक हो सकती है। Coaxial केबल के होने से इसमें इंटरनेट स्पीड इतनी अच्छी होती है।

इसकी स्पीड और उपलब्धता आपके घर या ऑफिस से केबल टीवी ऑपरेटर का ऑफिस कितनी दूर है इस पर निर्भर करती है।

4. Optical Fiber Connection

फाइबर ऑप्टिक तकनीक इलेक्ट्रिकल सिगनल को लाइट में बदलती है, जो की डेटा ले जा रहे होते है, और फिर उस लाइट को ट्रांसपेरेंट ग्लास फाइबर के माध्यम भेजती है जो इंसानी बल की साइज का होता है।

फाइबर ऑप्टिक DSL या केबल मोडम की तुलना में कई अधिक गति से डेटा भेजता है, इसकी स्पीड Mbps में होती है, हालाँकि ये 1Gbps की स्पीड सपोर्ट करता है।

इसमें इंटरनेट की स्पीड इतनी होती है की आप कुछ ही सेकंड में 1GB की एक पूरी मूवी डाउनलोड कर सकते है और आज कल फाइबर ऑप्टिक कनेक्शन ही सबसे ज्यादा चल रहा है।

5. Wireless Broadband Connection

ये भी बाकी ब्रॉडबैंड सर्विसेस की तरह ही होता है, इसमें केवल इतना अंतर होता है की ये वायरलेस होता है, किसी भी तरह के केबल की जरुरत नहीं होती है। ये radio frequency पर काम करता है। इसीलिए इसे Wireless या Wi-Fi कहा जाता है। इसकी स्पीड 5Mbps से ले कर 20Mbps तक हो सकती है। 

इसमें कई तरह की वायरलेस ब्रॉडबैंड तकनीक शामिल है, जैसे की:

I. Wireless Fidelity (Wi-Fi)

इस तरह के इंटरनेट कनेक्शन आपको घरो या ऑफिसो में देखने को मिल जाएंगे। ये DSL, फिक्स्ड वायरलेस, फाइबर, या केबल मोडम सर्विस का मिश्रण होता है। इसमें आपके पास एक मोडम होता है जिसमे एंटीना लगा होता है जिसके जरिये इंटरनेट आपके कंप्यूटर या मोबाइल पर आता है।

II. Mobile Wireless

जैसा की नाम से ही पता चलता है की ये मोबाइल में इंटरनेट चलने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। ये आपके मोबाइल SIM ऑपरेटर द्वारा दिया जाता है। ये आपके मोबाइल नेटवर्क पर निर्भर करता है और इसके लिए अलग अलग एरिया में टावर लगाए जाते है ऑपरेटर की तरफ से।

इसमें G का मतलब पीढ़ी (generation) होता है। 3G का मतलब 3rd generation, 4G का मतलब 4th generation और अब जल्द ही 5G आने वाला है यानि की 5th generation।

आपको क्या लगता है 5G सबसे पहले कौन सी कंपनी लाएगी JIO, Airtel या फिर VI (Voda Idea) । अपने विचार हमारे साथ नीच दिए गए कमेंट सेक्शन में शेयर करे।

III. सैटेलाइट ब्रॉडबैंड कनेक्शन

ये डायरेक्ट सैटेलाइट के माध्यम से दिया जाता है। इसकी इंटरनेट स्पीड बाकि सभी कनेक्शन से काफी ज्यादा होती है, लेकिन इसका खर्चा भी उतना ही ज्यादा होता है।

6. DIA (Direct Internet Access) Connection

DIA (Direct Internet Access) इसे हम लीज लाइन कनेक्शन के नाम से भी जानते है। ये ज्यादातर ऑफिस, स्कूल, या फिर किसी ऑर्गेनाइजेशन में इस्तेमाल होता है।

बाकि दूसरे सभी ब्रॉडबैंड कनेक्शन में एक सामान्य लाइन आपके क्षेत्र तक आती है जो एक बॉक्स से जुडी होती है और उसी बॉक्स की मदद से आपके घर और बाकि सबके घर में इंटरनेट की लाइन लगाई जाती है। जिससे आपके यहाँ इंटरनेट आता है। जिसकी वजह से इंटरनेट स्पीड बाकि घरो में बट जाती है। एक ही एरिया में अगर सभी लोग JIO का ही इंटरनेट इस्तेमाल कर रहे होंगे तो स्पीड कम मिलती है। जैसा की ऊपर मेने बताया हुआ है की इंटरनेट धीमा क्यों चलता है सेक्शन में।

DIA या फिर लीज लाइन में ऐसा नहीं होता है। इसमें आपको एक लाइन देदी जाती है आपके अलावा को दूसरा नहीं कर सकता है और ना ही ये किसी के साथ शेयर की जाती है। इसलिए इसमें कभी भी डाउन टाइम देखने को नहीं मिलती है और इटरनेट की स्पीड उतनी ही मिलती है जितनी कंपनी (ISP) द्वारा बया जाता है। अगर 8MB, 10MB, या 100MB की स्पीड होगी तो आपको उतनी ही स्पीड मिलेगी अपलोड और डाउनलोड दोनों में। फिर चाहे दिन हो या रात इसमें कभी भी स्पीड कम नहीं होती है।

ये नार्मल इंटरनेट कनेक्शन के मुकाबले काफी ज्यादा महँगा होता है क्योंकि इसमें जो लाइन दी जाती  केवल आप ही के लिए होती है।

इंटरनेट के मुख्य उपयोग

इंटरनेट के मुख्य उपयोग

इंटरनेट बहुत काम का आविष्कार है जिसे हम रोज इस्तेमाल करते है, कभी मोबाइल पर तो कभी कंप्यूटर पर। लेकिन हम उतना ही इस्तेमाल करते है जीती हमे जरूरत होती है।

वैसे तो इंटरनेट का इस्तेमाल अनगिनत जगहों पर अनगिनत तरह से किया जा सकता है लेकिन मैं आपको इसमें कुछ मुख्य इस्तेमाल बताएँगे।

1. ई-व्यापार

ऑनलाइन व्यापार या ई-बिज़नेस एक ऐसा शब्द है जिसका इस्तेमाल लगभग सभी ऑफिस या सभी ऑर्गेनाइजेशन में होता है। ई-बिज़नेस में फ़ाइनेंशियल संस्थान, ई-कॉमर्स वेबसाइट, जैसी और कई कंपनियाँ आती है।

सभी बड़ी कंपनियों के फ़ाइनेंशियल ट्रांसक्शन के अमाउंट लाखों में या फिर करोड़ो में होते है और इसीलिए सभी कंपनी अपने पैसो का लेन देन इंटरनेट के माध्यम से ऑनलाइन ही करती है।

ऑफिस से जुडी हुई जानकारी या फाइल को ऑनलाइन शेयर करने के लिए इंटरनेट का ही इस्तेमाल किया जाता है।

Amazon, Flipkart, JIOMart, जैसी कई ई-कॉमर्स कंपनियाँ अपने आर्डर लेने के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल करती है। यहाँ तक की उनके सारे काम इंटरनेट के माध्यम से ही होते है क्योंकि ये ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट है।

2. मास मीडिया

इंटरनेट का इस्तेमाल करके हम ऑनलाइन समाचार साइटों पर खबरे पढ़ सकते है, साहित्यिक, गैर-कल्पना, बच्चों, महिलाओं, आदि से जुड़े हुए लेख पढ़ सकते हैं।

जैसे ऑफलाइन TV और रेडियो हम देखते और सुनते है बिलकुल उसी तरह से इंटरनेट रेडियो और इंटरनेट टीवी भी है, जिसे हम ऑनलाइन देख और सुन सकते है इंटरनेट के इस्तेमाल से।

3. साहित्य, संगीत, सिनेमा

इंटरनेट के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक पुस्तकालयों से कई काम की e-Books को ऑनलाइन पढ़ पाते है।

इंटरनेट की मदद से आप सभी कई बार ऑनलाइन संगीत सुनते होंगे उन्हें डाउनलोड करते होंगे।

इंटरनेट की मदद से Netflix, YouTube, DisneyPlus, Hotstar इत्यादि जैसे प्लेटफॉर्म पर ऑनलाइन फ़िल्मे देखते है और उन्हें डाउनलोड भी करते है।

4. ईमेल (इलेक्ट्रॉनिक मेल)

एक मेल होता है जो डाकिया लेके आता और ऑनलाइन इंटरनेट के माध्यम से जो मेल भेजते है उसे ईमेल (इलेक्ट्रॉनिक मेल) कहा जाता है। जैसा की हम सभी ईमेल का इस्तेमाल करते है किसी को ईमेल भेजने या प्राप्त करने के लिए है।

5. शोध करने के लिए

आपके और मेरे जैसे काफी लोगो है जो अपनी पढ़ाई की सामग्री या ऑफिस के काम के लिए कोई आर्टिकल या किसी रिसर्च के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल करते है।

6. फाइले डाउनलोड या अपलोड करने के लिए

काफी सारी ऐसी वेबसाइट है जो मुफ्त या पेमेंट ले कर आपको फाइले डाउनलोड या अपलोड करने देती है। ये किसी भी तरह की फाइल हो सकती है जैसे की वीडियो, संगीत (MP3), PDF, सॉफ्टवेयर, एप्लीकेशन या अन्य कोई डॉक्यूमेंट। फाइले डाउनलोड या अपलोड करने के लिए इंटरनेट का ही इस्तेमाल किया जाता है।

7. फोरम विचार-विमर्श

काफी सारे फोरम और दूसरी वेबसाइट है जहाँ पर हम किसी भी विषय पर विचार-विमर्श कर सकते है या अपनी समस्या वहाँ पर दाल सकते है या किसी और के प्रशन का उत्तर दे सकते है। किसी भी ऑनलाइन फोरम वेबसाइट का इस्तेमाल करने के लिए इंटरनेट की जरुरत पड़ती है।

8. ऑनलाइन गेम्स

आप में से कई लोगो ने अपने कंप्यूटर या मोबाइल पर ऑनलाइन गेम खेले होंगे। उन्ही में एक जो आप सबका चहिता खेल था PUBG, जो अब सरकार की तरफ से भारत में बंद कर दिया गया है। उसके लिए भी इंटरनेट की जरुरत पड़ती है।

इनके अलावा भी काफी सारे काम है जो ऑनलाइन इंटरनेट के जरिये कर सकते है। अगर संक्षिप्त में कहु तो, आप जो भी काम ऑनलाइन या अपने ब्राउज़र पर करते हो उन सभी में इंटरनेट का इस्तेमाल होता है।

हैकिंग जैसे कामो के लिए और टोरेंट पर फाइल को अपलोड और डाउनलोड करने के लिए भी इंटरनेट का ही इस्तेमाल होता है।

इंटरनेट के फायदे और नुकसान

सब चीजों के + और – है। वैसे ही इंटरनेट के भी प्लस और माइनस पॉइंट है। वैसे तो इसके काफी फायदे और नुकसान है लेकिन मैं यहाँ पर आपको कुछ सामन्य फायदे और नुकसान के बारे में बताऊंगा, जो की आम जिंदगी में आपके बहुत काम आएगा।

इंटरनेट के फायदे

  • इंटरनेट के जरिये आज हम किसी भी तरह की डिजिटल जानकारी, फाइल या डाटा आसानी से एक जगह से दूसरी जगह पर भेज सकते है, वो भी कुछ ही सेकंडो में।
  • Amazon, Flipkart, JIoMart, Bigbasket, इत्यादि जैसी ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट पर जो चाहे खरीद सकते है। घर बैठे ही ऑनलाइन आर्डर हो जाता है।
  • ऑनलाइन ही फिल्में देख सकते है, संगीत सुन सकते है साथ इन्हे डाउनलोड भी कर सकते है।
  • क्लाउड कंप्यूटिंग के आ जाने से अब ज्यादातर सॉफ्टवेयर ऑनलाइन ही मिल जाते है, उन है इनस्टॉल भी नहीं करना होता और इमेज, वीडियो, ऑडियो, इत्यादि के एडिटिंग या फाइल कंवरटिंग जैसे काम ऑनलाइन ही हो जाते है।
  • आपका सारा काम घर बैठे ही हो जाता है जिससे काफी सारा समय बच जाता है।
  • इंटरनेट की मदद से आसानी से मिलो दूर किसी के भी साथ चैटिंग करके बात कर सकते हो। फेसबुक, ट्विटर जैसी कई अन्य सोशल मीडिया वेबसाइट पर से जानकारी हासिल कर सकते हो और वो भी बस घर बैठे ही कुछ सेकंडो में।
  • इंटरनेट के आ जाने से ऑनलाइन टिकट बुक कर सकते है, ऑनलाइन रिचार्ज कर सकते है, पैसो की लेन देन कर सकते है, ईमेल और वीडियो चैट करके जानकारी शेयर कर सकते है।
  • अब काफी सारे गेम ऑनलाइन हो चुके है। इंटरनेट ऑनलाइन गेमिंग में भी काफी मददगार सभीत हुआ है। जिससे आपको CD/DVD की जरुरत नहीं होती है और जब चाहा तब ऑनलाइन गेमिंग वेबसाइट पर जा कर गेम खेल सकते है।
  • क्लाउड स्टोरेज के आ जाने से आप अपना डाटा को ऑनलइन स्टोरेज वेबसाइट पर लम्बे समय तक स्टोर करके रख सकते है।
  • इंटरनेट का इस्तेमाल एक अकेला व्यक्ति, सरकार या कोई कंपनी भी कर सकती है। ये पूरी दुनिया के लिए उपलब्ध है।
  • इंटरनेट आज एक पूरी दुनिया बन चूका है जिससे हमे काफी कुछ सिख सकते है, ऑडियो, वीडियो, और टेक्स्ट की फॉर्म में दी गई जानकारी की मदद से।
  • यहाँ तक की हैकिंग के लिए भी इंटरनेट का ही इस्तेमाल किया जाता है।
  • ऑनलाइन TV देखनी हो या ऑनलाइन रेडियो सुन्ना हो तो उसके लिए भी इंटरनेट की जरुरत पड़ती है।

इंटरनेट के नुकसान

  • इंटरनेट का सबसे बड़ा नुकसान यह है की अगर एक बार इसकी लत लग गई तो फिर उसे छुड़ाना बहुत मुश्किल है। जिससे आप घंटो इस पर लगे रहेंगे और इससे आपका काफी समय ख़राब होगा।
  • कोई ही किसी भी तरह की जानकारी किसी के भी साथ शेयर कर सकता है, तो ये कहना मुश्किल होगा की, वो जानकारी सही है या गलत।
  • ऑनलाइन डाटा पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है। हैकर कभी भी आपके कंप्यूटर या जिस वेबसाइट पर अपने डाटा अपलोड किया है उसे हैक करके आपकी जानकारी चुरा सकते है।
  • कोई भी कुछ अपलोड या डाउनलोड कर सकता है, फिर चाहे वो सही हो या गलत।
  • सोशल मीडिया पर डाली की गई आपकी फोटो या दूसरी जानकारी सुरक्षित नहीं होती है। कोई भी आपकी निजी जानकारी को वह से चुरा कर किसी भी गलत काम के लिए इस्तेमाल कर सकता है।
  • जैसे अंडरवर्ल्ड होता है वैसे ही इंटरनेट की इस दुनिया में भी इंटरनेट का अंडरवर्ल्ड होता है, जिसे डार्क वेब कहाँ जाता है। आपकी जानकारी को चुरा कर वहाँ पर बेच दिया जाता है।
  • कई बार बैंक अकाउंट को हैक करके पैसे निकाल लिए जाते है और खाता धारक को इस बारे में पता भी नहीं चलता है।
  • छोटे बच्चों के लिए ये सही नहीं है, क्योकि इंटरनेट पर कई ऐसी चीजे होती है जो अश्लीलता फैलाती है और बच्चे उससे बिगड़ जाते है।
  • कई सारे अलग अलग तरह के ऑनलाइन धोखा धड़ी होते है। कई बार आम इंसान इस धोखा धड़ी का शिकार हो जाता है।
  • सभी वेबसाइट भरोसे की नहीं होती है, कई वेबसाइट ऐसी भी है, जिन को खोलने से आपके कंप्यूटर या मोबाइल में वायरस आ सकता है और वो वायरस किसी भी तरह का हो सकता है, जैसे की कंप्यूटर को नुसकान पहुंचने वाला या फिर आपकी गतिविधियो पर नजर रखने वाला या और किसी तरह का हो सकता है।

इंटरनेट की शब्दावली

इंटरनेट की शब्दावली

Attachment: यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी भी प्रकार की फ़ाइल इमेल संदेश में या फिर किसी भी फोरम में जोडकर इंटरनेट के माध्यम से किसी को भी भेजी या प्राप्त कर सकते है।

HTTP: वर्ल्ड वाइड वेब के माध्यम से सर्वर से यूजर के लिए डॉक्यूमेंट को ट्रांसफर करने के लिए कम्युनिकेशन प्रोटोकॉल को HTTP (Hypertext Transfer Protocol) कहा जाता है।

WWW: WWW (World Wide Web) ये आप तक जानकारी पहुंचने का काम करता है। सर्वर, HTML, HTTP, लिंक को एक साथ मिला कर काम करता है और आप तक ऑडियो, वीडियो, इमेज या टेक्स्ट फॉर्म में डॉक्यूमेंट को पहुँचता है।

FTP: FTP (File Transfer Protocol) का उपयोग एक कंप्यूटर से दूसरे कंप्यूटर के बीच फाइल ट्रांसफर करने के लिए किया जाता है।

TCP/IP: TCP/IP (Transfer Control Protocol / Internet Protocol), प्रोटोकॉल्स का ए‍क समूह होता है जो यह बताता है कि नेटवर्क में डेटा किस तरह से ट्रांसफर होगा या एक डिवाइस से दूसरे डिवाइस में डाटा कैसे ट्रांसफर होगा।

ASCII: ASCII (American Standard Code for Information Interchange) कम्प्यूटर में उपयोग करने के लिये character-encoding करने का एक तरीका है।

Bandwidth: इसके द्वारा इंटरनेट की गति नापी जाती है। बैंडविड्थ जितनी ज्यादा होगी, इंटरनेट की गति उतनी ही ज्यादा होगी।

Bookmark: ब्राउसर में स्थित विशेष लिंक होता है, जो उस पेज के लिंक को ब्राउज़र में सेव करने में मदद करता है। ये ऑप्शन सभी ब्राउज़र में होता है।

Cache: इंटरनेट पर सर्फिंग करते वक़्त जब आप किसी वेब पेज को खोलते है, तो वो पहले आपके कंप्यूटर लोड (डाउनलोड) होता है उसके बाद ही उस पेज को आप देख सकते है। जब वो पेज लोड होता है तो कुछ temporary फाइल आपके कंप्यूटर के ब्राउज़र में लोड हो जाती है, जहाँ पर वो temporary फाइल लोड होती है उसे ही Cache मेमोरी कहते है।

Cookies: ये आपके ब्राउज़र पर छोड़ी गई एक फाइल होती है। इसके द्वारा सर्वर उपयोगकर्ता के Preference तथा उसके द्वारा Search की गयी वेबसाइटों का विवरण वेब ब्राउजर पर संग्रहित रखता हैं और सर्वर को इसकी जानकारी देता है।

URL: किसी भी वेबसाइट की लिंक या वेब पेज की लिंक को ही URL (Uniform Resource Locator) कहा जाता है।

Hyperlink: किसी भी कंटेंट में जब कोई लिंक मिलती है जिसे क्लिक करके दूसरे आर्टिकल या दूसरे वेब पेज खुल जाता है उसे ही हाइपरलिंक कहा जाता है।

Protocol: किसी भी नियमों के समूह या किसी काम को करने के लिए बनाए गए नियमों को ही प्रोटोकॉल कहा जाता है।

अगर ये जानकारी आपको अच्छी लगी हो तो इस आर्टिकल को अपने दोस्तों, परिवार जनो और सोशल मीडिया पर जरूर शेयर करे और हम से जुड़े रहने और लेटेस्ट अपडेट के लिए आप हमें Facebook पर फॉलो करे।

Dharmendra Author on Web Janakari

मेरा नाम धर्मेंद्र मीणा है, मुझे तकनीक (कंप्यूटर, लैपटॉप, स्मार्टफोन्स, सॉफ्टवेयर, इंटरनेट, इत्यादि) से सम्बन्धी नया सीखा अच्छा लगता है। जो भी में सीखता हु वो मुझे दुसरो के साथ शेयर करना अच्छा लगता है। इस ब्लॉग को शुरू करने का मेरा मकसद जानकारी को ज्यादा से ज्यादा लोगो तक हिंदी में पहुंचना है।

शेयर करे:

4 thoughts on “इंटरनेट क्या है? – पूरी जानकारी”

  1. Good content, easy way to understand the history of internet . everyone should read this who want to know basic of internet

    Thanks Dharmendra 🙂

Leave a Comment

Your email address will not be published.