ऑपरेटिंग सिस्टम क्या होता है? 32-bit और 64-bit ऑपरेटिंग सिस्टम में क्या अंतर?

ऑपरेटिंग सिस्टम क्या होता है - (Operating System in Hindi)

ऑपरेटिंग सिस्टम के बारे में अक्सर सुनने में आता है कि ये वाला अच्छा है या वो इनस्टॉल करना सही होगा। लेकिन ऑपरेटिंग सिस्टम असल में होता क्या है?

ऑपरेटिंग सिस्टम (OS) एक तरह का सॉफ्टवेयर ही होता है। लेकिन ये बाकि सभी सॉफ्टवेयर की तरह नहीं होता है और इसे इनस्टॉल करने का तरीका भी बाकि सॉफ्टवेयर से अलग होता है।

ऑपरेटिंग सिस्टम को शार्ट में OS भी कहा जाता है। ये एक सिस्टम सॉफ्टवेयर होता है जो कंप्यूटर के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर को आपस में जोड़े रखता है। ये एक ऐसा सॉफ्टवेयर है जिससे यूजर कंप्यूटर के साथ आसानी कम्यूनिकेट कर पता है और इसके लिए यूजर को कंप्यूटर लैंग्वेज सिखने के भी जरुरत नहीं होती है।

सभी कम्प्यूटर को सही से काम करने और दूसरी एप्लीकेशन या प्रोग्राम को समझने और रन करने के लिए OS की जरूरत होती है। गूगल क्रोम, माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस, फोटोशॉप, गेम्स, इत्यादि जैसे एप्लीकेशन को एक प्लेटफार्म की जरुरत होती जिसमे वो रन हो सके और अपने टास्क को पूरा कर सके और ये प्लेटफार्म उन्हें OS प्रदान करता है।

बिना ऑपरेटिंग सिस्टम के कंप्यूटर कोई काम नहीं कर पाएगा। ऑपरेटिंग सिस्टम में कई सारे छोटे छोटे सॉफ्टवेयर का एक ग्रुप होता है, जिसे एक साथ जोड़ कर सिस्टम के स्टोरेज डिवाइस (जैसे की हार्ड डिस्क) में रखा जाता है।

प्रोग्राम का यही ग्रुप है जो कंप्यूटर रिसोर्सेज जैसे हार्डवेयर और उनके काम को मैनेज करता है। कब किस हार्डवेयर को क्या काम करना है और कब करना है, ये उन्हें ऑपरेटिंग सिस्टम ही बताता है। हार्डवेयर खुद से कुछ नहीं कर पाते है।

अगर आसान शब्दों में कहुँ तो OS यानी की ऑपरेटिंग सिस्टम कंप्यूटर की आत्मा है। जैसे एक इंसान के शरीर में अगर उसकी आत्मा न हो तो वो किसी काम का नहीं होता है वैसे ही अगर कंप्यूटर में OS नहीं है तो वो किसी काम का नहीं है। क्युकी उसे ये पता ही नहीं होगा की किस कमको कब करना है।

ऑपरेटिंग सिस्टम का इतिहास

पहले कंप्यूटरों में ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं होते थे। पहले के कंप्यूटरों पर हर एक प्रोग्राम को चलाने के लिए सभी प्रोग्राम के कोड पहले से ही कंप्यूटर में होते थे, जैसे की हार्डवेयर के साथ कम्युनिकेशन और कैलकुलेशन करना। उस समय सरल काम भी बहुत मुश्किल लगता था।

इस समस्या को देखते हुए कंप्यूटरों के मालिकों ने सिस्टम सॉफ़्टवेयर विकसित करना शुरू किया जो कंप्यूटर में शामिल प्रोग्रामो को राइट और एक्सीक्यूट करने की सुविधा प्रदान करता है, और इस तरह पहले ऑपरेटिंग सिस्टम का जन्म हुआ।

पहला ऑपरेटिंग सिस्टम General Motors ने 1956 में सिंगल IBM कंप्यूटर चलाने के लिए बनाया था। 1960 के दशक में, IBM ऑपरेटिंग सिस्टम बनाने का काम करने वाला पहला कंप्यूटर निर्माता था और अपने कंप्यूटरों में शामिल ऑपरेटिंग सिस्टम को डिस्ट्रीब्यूट करना शुरू कर दिया।

पहला ऑपरेटिंग सिस्टम 1950 के दशक में विकसित किया गया था, तब कंप्यूटर पर एक समय में केवल एक ही प्रोग्राम चला सकते थे। बाद में, कंप्यूटरों में ज्यादा से ज्यादा सॉफ़्टवेयर प्रोग्राम शामिल होने लगे, जिन्हें लाइब्रेरी भी कहा जाता है।

1960 के दशक के अंत में, Unix ऑपरेटिंग सिस्टम का पहला वर्जन विकसित किया गया था। ये प्रोग्रामिंग भाषा C में लिखा गया था, और अपने शुरुआती वर्षों के दौरान मुफ्त में उपलब्ध होता था। Unix आसानी से नई सिस्टम के अनुसार ढल जाता था और जल्दी ये सबके लिए मार्केट में सबके लिए उपलब्ध हो गया।

माइक्रोसॉफ्ट द्वारा बनाए गए पहले ऑपरेटिंग सिस्टम को विंडोज नहीं कहा जाता था, इसे MS-DOS कहा जाता था और इसे 1981 में बनाया गया था जब उसने सिएटल कंप्यूटर प्रोडक्ट्स से 86-DOS ऑपरेटिंग सिस्टम खरीदा था और IBM की जरुरत को पूरा करने के लिए इसे मॉडिफाइड किया था।

Windows नाम का प्रयोग पहली बार 1985 में किया गया था जब एक ग्राफिकल यूजर इंटरफेस बनाया गया था और MS-DOS के साथ जोड़ा गया था। उसके बाद धीरे धीरे कई सरे OS लांच हुए और पॉपुलर भी।

ज्यादातर सॉफ़्टवेयर प्रोग्राम किसी एक कंपनी के ऑपरेटिंग सिस्टम के साथ काम करने के लिए डिज़ाइन किए गए होते हैं, उदाहरण के लिए केवल Windows (जो की Microsoft का है) या केवल macOS (जो Apple का है)।

सॉफ़्टवेयर डवलपर आमतौर पर अपने सॉफ़्टवेयर के दूसरे वर्जन भी जारी करते हैं जो दूसरे ऑपरेटिंग सिस्टम या दूसरे वर्जन के साथ काम करते हैं।

ये जानना भी जरूरी है कि आपका ऑपरेटिंग सिस्टम 32-bit का है या 64-bit। ये एक कॉमन प्रश्न है जो वे सॉफ़्टवेयर या OS डाउनलोड करते समय दुवुधा में दाल देता हैं, कि हमे 32-bit डाउनलोड करना चाहिए या 64-bit। चलिए अब जान लेते है की ऑपरेटिंग सिस्टम काम कैसे करता है?

ऑपरेटिंग सिस्टम कैसे काम करता है?

जब कंप्यूटर चालू होता है तो सबसे पहले BIOS लोड होता है और सभी हार्डवेयर को चेक करता है की वो सभी ठीक से काम कर रहे है या नहीं। जैसे CD/DVD Writer/Reader, हार्ड डिस्क और फिर बाकि के हार्डवेयर। जबतक BIOS हार्डवेयर को चेक करता है OS लोड नहीं होता है।

उसके बाद बूटलोडर लोड होता है। फिर बूटलोडर OS और kernel को लोड करता है। OS लोड होने के बाद ये सभी सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर को चेक करता है की वो ठीक से काम कर रहे है या नहीं। जैसे की नेटवर्क कार्ड, इनपुट और आउटपुट पोर्ट, RAM, ग्राफ़िक कार्ड इत्यादि।

जब OS को लगता है की सब ठीक है तो फिर वो आपको पासवर्ड एंटर करने के लिए लॉगिन पेज दिखता है और आप अपना पासवर्ड दाल कर लॉगिन कर पाते है। मोबाइल और कंप्यूटर दोनों के लिए येही ही प्रोसेस है।

ऑपरेटिंग सिस्टम क्या काम करता है?

ऑपरेटिंग सिस्टम कंप्यूटर का सबसे जरुरी प्रोग्राम होता है, जो सभी साधारण और जरूरी काम करता है। जैसे की कीबोर्ड द्वारा इनपुट दिए जारहे कीयस को समझना, आउटपुट को स्क्रीन या मॉनिटर पर दिखाना, हार्ड डिस्क पर फाइल और फोल्डर को मैनेज करना और कंप्यूटर के सभी पार्ट्स (सभी हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर) से कम्यूनिकेट करना। ये साडी चीजे शामिल है। इसके अलावा ये और भी कई तरह के काम कर सकता है:

ऑपरेटिंग सिस्टम क्या काम करता है

1. मेमोरी मैनेजमेंट

प्राइमरी मेमोरी को ही मैन मेमोरी कहते है। ऑपरेटिंग सिस्टम प्राइमरी मेमोरी के हर एक काम को ट्रैक करता है यानी ये चेक करता है की कौन सा भाग किस प्रग्राम के लिए काम में लिया जा रहा है और कौन सा भाग काम में नहीं लिया जा रहा है।

मरोरी कहा इस्तेमाल होरही है, कितनी मेमोरी इस्तेमाल हो रही है इसका पता लगाता है और जरूरत पड़ने पर मेमोरी उपलब्ध भी कराता है।

मल्टीप्रोसेसिंग में ये तय करता है की किस प्रोसेस को कब और कितनी मरोरी मिलेगी। जब किसी प्रोग्राम का काम ख़त्म हो जाता है तो असाइन की गई मरोरी को सेव कर लेता है।

2. प्रोसेसर मैनेजमेंट

मुटीप्रोग्रामिंग में, OS तय करता है की किस प्रक्रिया को प्रोसेसर इस्तेमाल करने के लिए कब और कितने समय के लिए दिया जाना है। इसे प्रोसेस शेडूलिंग कहा जाता है।

OS प्रोसेसर और प्रोसेस पर नजर रखता है। इस काम के लिए OS के जिस प्रोग्राम का इस्तेमाल होता है उसे ट्रैफिक कंट्रोलर के नाम से जाना जाता है। OS प्रोसेस को काम पूरा करने के लिए CPU असाइन करता है और काम ख़त्म होने के बाद प्रोसेसर को फ्री कर देता है।

3. डिवाइस मैनेजमेंट

ऑपरेटिंग सिस्टम अपने सम्बंधित ड्राइवर्स के माध्यम से डिवाइस मैनेजमेंट का कम्युनिकेशन का मैनेजमेंट करता है। इसके लिए OS सभी प्रोग्रामो पर नजर रखता है और इस काम के लिए OS के जिस प्रोग्राम का इस्तेमाल होता है उसे इनपुट आउटपुट कंटोरलर के नाम से जाना जाता है।

OS तय करता है की कौन से डिवाइस को प्रोसेस को डिवाइस कब और कितने समय के लिए देनी है। जब डिवाइस का काम पूरा हो जाता है तब OS उसे इनएक्टिव यानी की बंद कर देता है।

4. फाइल मैनेजमेंट

फाइल को आसान तरीको से एक्सेस करने के लिए डायरेक्टरी में स्टोर किया जाता है। OS इन फाइल की सुचना, स्थान, यूजर, स्टेटस, इत्यादि पर नजर रखता है। ये हर सुचना को ट्रैक करता है। इसके साथ ही फाइल का लोकेशन क्या है, फाइल कब बनाई गई, फाइल कितने साइज की है, किस यूजर ने बनाई थी ये सारी जानकारी भी OS रिकॉर्ड करता है।

5. सिक्योरिटी

OS हमारे सिस्टम को अनऑफिसियल एक्सेस करने से रोकता है। मतलब की बिना की परमिशन के कोई और यूजर आपके कंप्यूटर या फाइल का इस्तेमाल नहीं कर सकता है और इसके लिए OS आपको पासवर्ड सेट करने का ऑप्टोइन भी देता है।

जब आप अपना कंप्यूटर चालू करेंगे तब वो आपसे पासवर्ड पूछेगा उसके बाद ही आगे की प्रोसेस करने देगा। इससे आपका कंप्यूटर सुरक्षित रहता है।

6. सिस्टम परफॉरमेंस

ऑपरेटिंग सिस्टम आपके कंप्यूटर या लैपटॉप की परफॉरमेंस का भी ध्यान रखता है। OS आपके डिवाइस या सिस्टम के हार्डवेयर के अनुसार ही ही काम करता है। हार्डवेयर की क्षमता के अनुसार ही ये उसे काम असाइन करता है ताकि आपके कंप्यूटर पर जायदा लोड न पड़े और साथ कोई एरर आता है तो उसे भी संभालता है।

ऑपरेटिंग सिस्टम के प्रकार

समय समय पर टेक्नोलॉजी में बदलाव किये जा रहे है। साथ ही कंप्यूटर ने भी टेक्नोलॉजी में काफी विकास किया है। जब से कंप्यूटर बना है तब ही से ऑपरेटिंग सिस्टम ने भी काफी इस्तेमाल किया जा रहा है।

कंप्यूटर को कम्पेटिबल बनाने के लिए OS के नए नए वर्जन को विकसित किया गया है। ऑपरेटिंग सिस्टम के भी कई सारे प्रकार है, जैसे की:

  1. मल्टीयूज़र ऑपरेटिंग सिस्टम
  2. सिंगल यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम
  3. मल्टीटास्किंग ऑपरेटिंग सिस्टम
  4. मल्टीप्रोसेसिंग ऑपरेटिंग सिस्टम
  5. नेटवर्क ऑपरेटिंग सिस्टम
  6. डिस्ट्रिब्यूटेड ऑपरेटिंग सिस्टम

आइए सभी के बारे में विस्तार से समझते है:

1. मल्टीयूज़र ऑपरेटिंग सिस्टम

ये ऑपरेटिंग सिस्टम एक साथ दो या दो से ज्यादा यूजर को काम करने की सुविधा देता है। ये OS कंप्यूटर नेटवर्क में इस्तेमाल किया जाता है जो की एक ही समय में एक ही डाटा और एप्लीकेशन को एक्सेस करने देता है।

इसे बनाने का मुख्य कारण एक समय में कई यूजर के साथ अलग अलग रिसोर्सेज को शेयर करना था। इसका इस्तेमाल जयादातर बड़ी आर्गेनाइजेशन, सरकारी क्षेत्र, बड़े विश्वविद्यालय या यूनिवर्सिटी, और सर्वर में किया जाता है, जैसे कि उबंटू सर्वर या विंडोज सर्वर। ये सर्वर कई यूजर को एक ही समय में ऑपरेटिंग सिस्टम, कर्नेल और हार्डवेयर एक्सेस करेने देता हैं।

2. सिंगल यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम

ये ऑपरेटिंग सिस्टम एक समय में एक ही यूजर को काम करने देता है। पर्सनल कंप्यूटर में इस्तेमाल होने वाला ऑपरेटिंग सिस्टम सिंगलर यूजर OS है जिसे एक समय में एक काम को करने के लिए बनाया गया है।

ये कंप्यूटर या इसी तरह की मशीन पर काम करने के लिए करने के लिए बनाया गया है जिसे केवल एक समय में एक ही यूजर इस्तेमाल कर सकता है। इस प्रकार का OS आमतौर पर वायरलेस फोन और टू-वे मैसेजिंग डिवाइस जैसे उपकरणों पर इस्तेमाल किया जाता है।

इसमें एक समय में एक ही यूजर काम कर सकता है लेकिन एक समय में कई अलग अलग काम कर सकते है। जैसे की गाने सुनते हुए ईमेल टाइप करना या डाउनलोड पर कोई फाइल लगा दे और साथ में वीडियो भी देखते जाए इसके अलावा और भी बहुत कुछ कर सकते है।

इसे ज्यादातर पर्सनल काम करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसमें मूवीज देकना, डाउनलोड करना, टाइपिंग करना इत्यादि कर सकते है।

3. मल्टीटास्किंग ऑपरेटिंग सिस्टम

ये ऑपरेटिंग सिस्टम यूजर को एक साथ कई अलग अलग प्रोग्राम को चलाने की सुविधा देता है। इस ऑपरेटिंग सिस्टम में आप एक ही समय ईमेल भी लिख सकते है और साथ ही गाने भी सुन सकते है या फेसबुक भी चला सकते है। इन्हे मल्टीप्रोग्रामिंग या मल्टीप्रोग्रामिंग बैच ऑपरेटिंग सिस्टम भी कहा जाता है।

डेस्कटॉप ऑपरेटिंग सिस्टम में मल्टीटास्किंग का इस्तेमाल किया जाता है। मल्टीटास्किंग मेथड का इस्तेमाल करने वाला Unix पहला ऑपरेटिंग सिस्टम था। Windows NT और Windows 95 विंडोज के पहले वर्जन थे जो मल्टीटास्किंग का इस्तेमाल करते थे।

4. मल्टीप्रोसेसिंग ऑपरेटिंग सिस्टम

इसमें दो या दो से ज्यादा प्रोसेस्सर एक दूसरे से जुड़े रहते है। इस OS में सिस्टम में अलग अलग या इंडेपेंडेंट प्रोग्राम को इंस्ट्रक्शन एक ही समय में अलग अलग प्रोसेसर द्वारा दिये जाते है। इसका मतलब है की प्रोसेसर द्वारा अलग अलग प्रोसेस का इंस्ट्रक्शन एक के बाद एक दिया जाता है, जो की एक ही प्रोग्राम से मिलते है। कई प्रोसेसर या CPU एक साथ जुड़े होने से ये काफी फ़ास्ट हो जाता है। इसे मल्टीप्रोसेसर ऑपरेटिंग सिस्टम के नाम से भी जाना जाता है।

5. नेटवर्क ऑपरेटिंग सिस्टम

ये उन कंप्यूटर को अपनी सर्विस देती जो एक ही नेटवर्क से कनेक्टेड होते है। ये एक ऐसा OS है जो की कई कम्पूटरो एक साथ कम्यूनिकेट करने, फाइल शेयर करने और दूसरे डिवाइस या हार्डवेयर को एक्सेस करने देता है। नेटवर्क ऑपरेटिंग सिस्टम सर्वर पर रन होने वाला OS है।

ये हार्ड डिस्क, कंप्यूटर, प्रिंटर, इत्यादि को दूसरे कंप्यूटर या डिवाइस  शेयर करता है। ये दो प्रकार के होते है पीयर टू पीयर और क्लाइंट-सर्वर सिस्टम।

पीयर टू पीयर में कोई सर्वर नहीं होता है सभी फाइल और रिसोर्सेज डायरेक्ट ही इस्तेमाल किये जाते है। पीयर टू पीयर तकनीक का इस्तेमाल टोरेंट में सबसे ज्यादा किया जाता है।

क्लाइंट-सर्वर में सर्वर की जरुरत होती है। इसमें सबसे पहले डाटा सर्वर पर जाता है और क्लाइंट उसे एक्सेस कर पता है। इसमें सभी कामो के लिए पहले सर्वर पर रिक्यूएस्ट भेजनी पड़ती उसके बाद ही सर्वर क्लाइंट को वो डाटा निकल कर देता है।

6. डिस्ट्रिब्यूटेड ऑपरेटिंग सिस्टम

ये वो OS होते है जो डाटा को स्टोर करते है और कई लोकेशन पर डिस्ट्रीब्यूट कर देते है। इसमें कई सारे सेंट्रल प्रोसेसर का इस्तेमाल किया जाता है और इनमे काम को बाँट दिया जाता है। ये सेंट्रल प्रोसेसर कोई कंप्यूटर, नोड या कोई दूसरा डिवाइस हो सकता है। ये सभी कंप्यूटर आपस में कम्युनिकेशन लाइन के द्वारा एक दूसरे से जुड़े रहते है।

इसका एक फायदा ये है की अगर कोई एक कंप्यूटर या नोड बंद हो जाए तब भी दूसरे कंप्यूटर से काम किया जा सकता है। ये आपस में LAN/WAN के ज़रिये जुड़े रहते है। ये 5 प्रकार के होते है Client-Server Systems, Peer-to-Peer Systems, Middleware, Three-tier और N-tier।

7. बैच ऑपरेटिंग सिस्टम

शुरुआत में, कंप्यूटर बेहद बड़ी मशीनें थीं जो एक कंसोल से चलती थीं। आमतौर पर, इनपुट के लिए टेप ड्राइवर या कार्ड रीडर का इस्तेमाल किया जाता था, और आउटपुट के लिए टेप ड्राइव, पंच कार्ड और लाइन प्रिंटर का इस्तेमाल किया जाता था। यूजर का सिस्टम के साथ कोई डायरेक्ट इंटरफ़ेस नहीं था, और काम एक्सीक्यूट एक बैच सिस्टम में किया जाता था। इस पुरे प्रोसेस को बैचेड ऑपरेटिंग सिस्टम के रूप में जाना जाता है।

1970 के दशक में बैच प्रोसेसिंग बहुत लोकप्रिय था। काम को बैचों में एक्सीक्यूट किया जाता था। लोगों के पास एक ही कंप्यूटर हुआ करता था जिसे मेनफ्रेम कहा जाता था। बैच ऑपरेटिंग सिस्टम का इस्तेमाल करने वाले यूजर डायरेक्ट कंप्यूटर से इंटरैक्ट नहीं करते थे।

8. रीयल-टाइम ऑपरेटिंग सिस्टम

ये बहुत ही महत्वपूर्ण टाइप को OS है। ये OS काम को दिए हुए समय में पूरा कर देता है। इसमें इनपुट बेहद कम समय में प्राप्त और प्रोसेस किए जाते हैं। उदाहरण के लिए ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम, मेडिकल इक्विपमेंट, इत्यादि होते है।

कंप्यूटर और मोबाइल में इस्तेमाल होने वाले ऑपरेटिंग सिस्टम

कंप्यूटर और मोबाइल में इस्तेमाल होने वाले कई ऑपरेटिंग सिस्टम है लेकिन यहाँ पर केवल कुछ पॉपुलर OS के बारे में ही बताया गया है।

कंप्यूटर ऑपरेटिंग सिस्टम

1. MS-DOS

माइक्रोसॉफ्ट डिस्क ऑपरेटिंग सिस्टम (MS-DOS) x86 बेस्ड पर्सनल कंप्यूटरों के लिए एक ऑपरेटिंग सिस्टम है जो Microsoft द्वारा विकसित किया गया था। इसे बाद में IBM PC DOS के रूप में रीब्रांड कर दिया गया। इसे “DOS” नाम से भी जाना जाता है।

1980 के दशक के दौरान MS-DOS IBM PC कम्पेटिबल पर्सनल कंप्यूटरों के लिए मुख्य ऑपरेटिंग सिस्टम था। माइक्रोसॉफ्ट के विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम में ग्राफिकल यूजर इंटरफेस (GUI) को पेश करके धीरे-धीरे DOS को हटा दिया गया।

MS-DOS में GUI (ग्राफिकल यूजर इंटरफेस) सपोर्ट नहीं करता है और माउस इनपुट ऑप्शन भी नहीं होता है। ये कैरेक्टर-बेस्ड इंटरफ़ेस सिस्टम है जहां कमांड-लाइन प्रॉम्प्ट पर टेक्स्ट में सभी कमांड दर्ज किए जाते हैं।

अगर आपने कभी भी विंडोज में कमांड प्रांप्ट का इस्तेमाल किया होगा तो आपको की उसमे पूरा काम कुछ कोड के ज़रिये होता है। कमांड प्रांप्ट DOS का ही एक छोटा वर्जन है।

ये सिंगल यूजर OS है। DOS फाइलों, फ़ोल्डरों को प्रबंधन करता है और प्रोग्राम लोडिंग और एक्सीक्यूट की अनुमति देता है। ये डिस्क, मेमोरी जैसे हार्डवेयर डिवाइस को कण्ट्रोल करता है और रिसोर्सेज को आलोकेट करता है। ये 16-bit फ़ाइल आलोकेट टेबल (FAT16) का इस्तेमाल करता है।

2. Windows

Windows ऑपरेटिंग सिस्टम
Windows ऑपरेटिंग सिस्टम

विंडोज माइक्रोसॉफ्ट के ज़रिये बनाया एक ग्राफिकल ऑपरेटिंग सिस्टम है। ये यूजर को फ़ाइलों को देखने और स्टोर करने, सॉफ़्टवेयर चलाने, गेम खेलने, वीडियो देखने और इंटरनेट से कनेक्ट करने देता है। इसे घरेलू और प्रोफेशनल दोनों के लिए जारी किया गया था।

माइक्रोसॉफ्ट ने विंडोज का पहला वर्जन 1.0 के नाम से लांच किया था। बाद में इसके कई अलग अलग वर्जन लांच किये गए और अभी लेटेस्ट विंडोज 11 है।

जब 2001 में माइक्रोसॉफ्ट ने XP Windows लांच किया गया था, तो कंपनी ने पर्सनल और बिज़नेस इस्तेमाल के लिए इसके अलग अलग वर्जन को बनाए। इसे इंटेल और एएमडी प्रोसेसर जैसे x86 (32-bit) और x64 (64-bit) हार्डवेयर के आधार पर डिजाइन किया गया था।

विंडोज के कैफ अलग अलग वर्जन है जिसमे सबसे ज्यादा पॉपुलर है Windows Home और Windows Professional।

Windows Home विंडोज का एक बेसिक एडिशन है। इसमें विंडोज़ के सभी बेसिक फंक्शन होते है, जैसे की वेब ब्राउज़ करना, इंटरनेट से कनेक्ट करना, वीडियो गेम खेलना, ऑफिस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करना, वीडियो देखना। इसके अलावा, ये कम खर्चीला है और कई नए कंप्यूटरों और लैपटॉप में पहले से ही इंस्टॉल आता है।

Windows Professional को Window Pro या Win Pro के नाम से भी जाना जाता है। ये विंडोज का एक एडवांस्ड वर्जन है, जो छोटे व्यापरियों और एडवांस्ड यूजर के लिए फायदेमंद है। इसमें विंडोज होम की सारी सुविधाएं शामिल हैं साथ में Remote Desktop, Bitlocker, Trusted Boot, Hyper-V जैसे कई और फैसिलिटी है।

विंडोज में सबसे बड़ा फायदा ये है की ये ग्राफिकल यूजर इंटरफ़ेस है जिससे कोई भी इस पर आसानी से काम कर सकता है और समझ भी सकता है। इसके लिए यूजर को कोई भी दूसरी भाषा या कोडिंग सिखने की भी जरुरत नहीं है क्यूंकि ये यूजर की भाषा में ही कम्यूनिकेट करता है। जिससे यूजर आसानी से सब समझ सकते है।

इसके अलावा विंडोज OS में अपनी जरुरत के अनुसार सॉफ्टवेयर को इनस्टॉल कर सकते है और हटा भी सकते है। Windows 10 और उसके बाद के वर्जन में सुरक्षा काफी ज्यादा मजबूत कर दी है। यहाँ तक की आप नया सॉफ्टवेयर भी बना सकते है।

3. Linux

Linux ऑपरेटिंग सिस्टम
Linux ऑपरेटिंग सिस्टम

लिनक्स भी दूसरे ऑपरेटिंग सिस्टम की तरह ही एक ऑपरेटिंग सिस्टम है। 90 के दशक के मध्य से Linux हमारे लॉच हुई थी। इसे स्मार्टवॉच से लेकर सुपर कंप्यूटर तक में इस्तेमाल किया जाता है। ये हमारे फोन, लैपटॉप, PC, कारों और यहां तक ​​कि रेफ्रिजरेटर में भी हर जगह है। यह डवलपर्स और नार्मल कंप्यूटर यूजर भी इस्तेमाल करते है।

विंडोज और मैक OS को इस्तेमाल करने की उसे खरीदना पड़ता है लेकिन लिनक्स पूरी तरह से फ्री और ओपन सोर्स है। इसमें भी विंडोज और मैक OS की तरह ग्राफिकल यूजर इंटरफ़ेस होता है। ये फ्री होने की वजह कोई भी किसी भी तरह का बदलाव कर सकता है यहाँ ताकि इसके सोर्स कोड का इस्तेमाल करके अपना खुद का OS भी बना सकते है।

जो काम विंडोज और मैक OS में होते है वही सारे काम लिनक्स में भी किया जा सकता है। जितने भी सॉफ्टवेयर बनाने वाली बड़ी कंपनी है वो सभी लिनक्स, विंडोज और मैक OS तीनो के लिए ही सॉफ्टवेयर बनाती। यानी की सभी पॉपुलर सॉफ्टवेयर आपको लिनक्स के लिए भी मिल जाएंगे।

लिनक्स की खुद की कम्युनिटी होती जहा काफी सारे सॉफ्टवेयर आपको फ्री में मिल जाते है और अगर कोई प्रॉब्लम होती है या कोई सवाल है या कुछ सीखना चाहते है फ्री में मदद करने के लिए काफी यूजर होते है उस कम्युनिटी में और टुटोरिअल भी होते है।

केवल इतना ही नहीं लिनक्स में भी हम मूवी देख सकते है, गाने सुन सकते है, इंटेरेट सर्फिंग कर सकते है जैसे विंडोज में डवलपर प्रोग्राम बनाते है वैसे लिनक्स में भी प्रोग्राम बनाए जा सकते है, कोडिंग कर सकते है।

कई सारी अलग अलग तरह की लिनक्स होती है और उन सब का अपना खुद का अलग अलग वर्जन भी होता है। जैसे Ubuntu, Linux Mint, Fedora, Red Hat, Kali Linux (हैकिंग में इस्का इस्तमाल सबसे ज्यादा किया जाता है), Garuda Linux (ये एक इंडियन लिनक्स है), इत्यादि। ये कुछ पॉपुलर लिनक्स है हालाँकि इनके अलावा और भी है।

हर एक लिनक्स में अलग अलग फीचर और फंक्शन मिलेंगे और हर एक का यूजर इंस्टरफेस भी अलग होगा लेकिन यकीं माने लिनक्स पर काम करने का मजा ही बिलकुल अलग है और सबसे बड़ी बाद उसमे किसी भी तरह का वायरस और मैलवेयर काम नहीं करता है। इसका इस्तेमाल सर्वर में सबसे ज्यादा किया जाता है।

5. Unix

Unix एक पॉवरफुल ऑपरेटिंग सिस्टम है जिसे शुरू में Ken Thompson, Dennis Ritchie ने 1970 में बनाया था। Unix को ऑपरेटिंग सिस्टम का दिल माना जाता था। ये बाकि सभी OS की तरह है एक ऑपरेटिंग सिस्टम है।

Unix भी लिनक्स की तरह ही ओपन सोर्स है और फ्री में डाउनलोड कर सकते है। ये एक मल्टीयूज़र और मल्टीटास्किंग OS है और इसे C language पर लिखा गया है। यानी की इसका कोड C programing language पर बेस्ड है। इसका इस्तेमाल ज्यादातर सर्वर में किया जाता है।

Unix में भी बाकि सभी OS की तरह ग्राफिकल यूजर इंटरफ़ेस होता है। इसमें भी कई अलग अलग वर्जन जिन में से जो सबसे ज्यादा पॉपुलर है वो है Sun Solaris, GNU/Linux, और MacOS X। एप्पल का ऑपरेटिंग सिस्टम भी Unix बेस्ड है। ये लिनक्स से ज्यादा अलग नहीं है दोनों में थोड़ा सा ही अंतर है।

6. Mac OS

Apple ऑपरेटिंग सिस्टम
Apple ऑपरेटिंग सिस्टम

Mac का पूरा नाम Macintosh है। ये Apple का ऑपरेटिंग सिस्टम है और केवल आप एप्पल की मशीन में ही इनस्टॉल आता है जैसे की Mac लैपटॉप और कंप्यूटर। इसमें भी ग्राफिकल यूजर इंटरफ़ेस है अबकी सभी की तरह।

ये Apple का OS होने के साथ साथ बाकि सब से काफी महंगा भी है। इसमें सबसे अच्छी बात ये है Apple अपने OS और उसकी सिक्युरिटी हर 3 या 6 महीने में अपडेट करता रहता है इसलिए इसे हैक करना काफी मुस्खिल होता है।

हालाँकि आप जुगाड़ से इसे HP, Dell, ASUS, Lemovo इत्यादि जैसे दूसरे कम्पूटरो में भी इनस्टॉल कर सकते है। सभी पॉपुलर सॉफ्टवेयर आपको इस OS के लिए भी मिल जाएंगे। इसमें भी फ्री और पेड सॉफ्टवेयर मिलते है साथ ही वो सभी काम कर सकते है जो बाकि OS में करते है। जैसे की इंटरनेट सर्फिंग, इ-बुक पढ़ना, ऑफिस का काम, इत्यादि। इसमें आपका कंप्यूटर बहुत काम हैंग और क्रैश होता है जैसे की विंडोज होता है।

ये एक तरह से विंडोज का अल्टरनेटिव है हालाँकि विंडोज किसी भी कंप्यूटर में इनस्टॉल की जा सकती है और एप्पल OS  से  सस्ती है वही एप्पल OS केवल एप्पल के कंप्यूटर में ही काम करता है अलग से से काफी महंगा आता है।

7. Chrome OS

Chrome OS गूगल का OS जो ये भी ओपन सोर्स है और फ्री में मिल जाता है। ये विंडोज और MacOS का अल्टरनेटिव है। इसमें भी आपके विंडोज और MacOS की ही तरह इंटरनेट सर्फिंग, मूवी देखना, गाने सुन्ना, जैसे कई अकम कर सकते है। ये लिनक्स बेस्ड OS है। पहले क्रोम OS लैपटॉप को Chromebook नाम दिया गया था।

मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम

1. Android

Android मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम
Android मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम

एंड्राइड एक मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम है। ये लिनक्स बेस्ड OS है। इसे टच स्क्रीन मोबाइल डिवाइस के लिए बनाया गया है जैसे की स्मार्टफोन और टेबलेट। इसे सबसे पहले Andrew E. Rubin ने 2003 में बनाया था। बाद में गूगल ने 2005 इसे खरीद लिया। इसे सबसे पहले HTC मोबाइल में इस्तेमाल किया गया था।

ये फ्री और ओपन सोर्स OS है। गूगल के खरीदने के बाद अब ये गूगल का ही है और मोबाइल इस्तेमाल किया जाता है। इसमें पहले Google क्रोम, Google Play Store और संबंधित Google Play सर्विस इस्टॉल होती है।

इसमें थ्रीड पार्टी एप्प लांचर का इस्तेमाल करके फ़ोन और टेबलेट का लुक बदला जा सकता है। इसमें होम स्क्रीन पर Widgets सेट कर सकते है जिससे हमे बार बार मेनू या एप्प खोलना नहीं पड़ेगा।

एंड्रॉइड ओपन-सोर्स होने की वजह से डवलपर्स अपने OS  को मॉडिफाइड कर सकते हैं और अपना खुद का वर्जन बना सकते हैं, जिसे यूजर स्टॉक OS के स्थान पर डाउनलोड और इंस्टॉल कर सकते हैं।

इसे Java, C/C++, XML जैसी और भी कंप्यूटर प्रोग्रामिंग भासाओ को मिला कर बनाया जाता है। एंड्राइड में काफी सारी फ्री और पेड एप्लीकेशन मिलती है। गूगल प्ले स्टोर के अलावा और भी कई अलग अलग जगह से एंड्राइड की एप्लीकेशन डाउनलोड करि जा सकती है जैसे की SlideME, Opera Mobile Store, Mobango, F-droid, Amazon Appstore इत्यादि।

इसका इस्तमाल अब मोबाइल, टेबलेट, स्मार्ट वाच, स्मार्ट TV, रफेरीग्रेटर, वाशिंग मशीन जैसी कई डिवाइस में किया जाता है। इसका एक प्लस पॉइंट ये है कि Android Emulator का इस्तेमाल करके हम इसे कंप्यूटर या लैपटॉप में भी आसानी से इस्तेमाल कर सकते है।

Android Emulator बिना मोबाइल के एप्लीकेशन को टेस्ट करने लिए बनाया गया है लेकिन इसके अलावा और भी काम कामो में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। एमुलेटर कम्पलीट डिवाइस के एक वर्चुअल एनवायरनमेंट क्रिएट करता है जिससे एंड्राइड OS और उसमे इस्तेमाल होने वाली एप्प को यही लगता है वो एक एंड्रॉइड डिवाइस का ही इस्तेमाल कर रही है। एंड्राइड डवलपर ज्यादातर इस ही का इस्तेमाल करते है।

2. iOS

ios
ios

iOS एप्पल मोबाइल डिवाइस का ऑपरेटिंग सिस्टम है। इसका इस्तेमाल  iPhone, iPad और iPod में किया जाता है। इसे पहले iPhone OS के नाम से जाना जाता था बाद में iOS का नाम दिया गया। केवल एप्पल के डिवाइस में ही इनस्टॉल मिलता है। जिस तरह से हम एंड्राइड को Samsung, HTC, ASUS, MI और भी कई दूसरे मोबाइल इस्तेमाल कर सकते है वही iOS का इस्तेमाल एप्पल डिवाइस में ही किया जा सकता है।

जिस तरह एंड्राइड में Google Play Store में एप्लीकेशन मिल जाती है उसी तरह iOS में Apple App Store होता है जहा से आप एप्लीकेशन इसनस्टाल कर सकते हो। इसे आप मॉडिफाइड भी नहीं कर सकते क्यों ये OS फ्री नहीं है।

जो काम एंड्राइड डिवाइस में हम करते है वो सभी हम iOS में भी कर सकते है जैसे की वीडियो देखना, गाने सुन्ना, इंटरनेट सर्फिंग करना, इत्यादि। iOS को बनने के लिए C, C++, Objective-C, Swift, assembly language का इस्तेमाल किया जाता है। ये Unix बेस्ड OS है। इसका इस्तेमाल एप्पल किस्मार्टवॉच में भी किया जाता है और अब तो एप्पल इसे कार में भी लांच करने वाला है। इसमें एक खास बात ये है की ये कभी भी एंड्राइड की तरह हैंग नहीं होता है।

3. Windows Mobile OS

Windows Mobile OS अब बंद हो चुके जो की माइक्रोसॉफ्ट ने बनाया था। ये विंडोज बेस्ड OS था लेकिन इसकी डिमांड ज्यादा नहीं थी इसलिए माइक्रोसॉफ्ट को इसे बंद करना पड़ा।

विंडोज कंप्यूटर में जो फीचर थे वही सब विंडोज फ़ोन में भी थे। लेकिन यूजर को इसका इस्तेमाल ठीक से समझ में नहीं आया इसलिए इसकी डिमांड भी कम थी। इस वो सभी काम होते थे जो हम एक एंड्राइड या iOS में कर सकते है।

इसके भी कई अलग अलग वर्जन लांच किये थे लेकिन समय के साथ वो भी बंद हो गए।

4. Blackberry OS

Blackberry OS एक मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम था जिसे कनाडा की कंपनी ब्लैकबेरी लिमिटेड ने अपने स्मार्टफोन के लिए बनाया था। ब्लैकबेरी द्वारा अपने हैंडहेल्ड, विशेष रूप से ट्रैकव्हील, ट्रैकबॉल, ट्रैकपैड और टचस्क्रीन में उपयोग के लिए मल्टीटास्किंग जैसे डिवाइस सपोर्ट करता था। लेकिन हाल ही में कपनी ने घोषणा की वो अब ब्लैकबेरी फ़ोन और OS दोनों को ही बंद कर रही है।

ये सेक्रिटी फीचर के हिसाब से काफी अच्छा था क्यों इसकी सुरक्षा काफी टाइट थी कोई भी आसानी से इसे ब्रेक नहीं कर पाता था। इसकी सुरक्षा इतनी मजबूत इसलिए थी क्युकी ये C++ प्रोग्रामिंग लैंग्वेज पर बनाया गया था।

5. Firefox OS

जब एंड्राइड लांच हुआ और पॉपुलर हुआ तब कई कमपनीयो ने अपने अपने OS लंच किये थे लेकिन वो सभी उतनी पॉपुलर नहीं हुए इसलिए सब बंद हो गए उन्ही में एक था Firefox OS।

Firefox OS अब बंद हो चूका है। ये एक ओपन-सोर्स ऑपरेटिंग सिस्टम था – जो मोज़िला ने स्मार्टफोन, टैबलेट कंप्यूटर, स्मार्ट टीवी और डोंगल के लिए बनाया था। ये Firefox web browser, Gecko और Linux kernel के रेंडरिंग पर बेस्ड था। इसे पहली बार 2013 में लांच किया गया था।

6. Symbian और Bada

ऐंड्रोइडके मार्किट में आने से पहले Symbian और Bada ये दोनों ही मार्किट में काफी ज्यादा पॉपुलर थे लेकिन एंड्राइड जब से पॉपुलर हुआ है ये दोनों भी अब बंद हो गए है। Symbian Nokia में इस्तेमाल किया जाता था वही Bada Samsung के मोबाइल में। ये दोनों इनके खुद के OS थे।

32-bit और 64-bit ऑपरेटिंग सिस्टम में क्या अंतर?

कंप्यूटर में डाटा को byte में मापा जाता है और इस प्रोसेसिंग को आमतौर पर bit प्रोसेसिंग के रूप में दिखाया जाता है। आमतौर पर, दो प्रकार के प्रोसेसर होते हैं, 32-bit प्रोसेसर और 64-bit प्रोसेसर। इस प्रकार के प्रोसेसर हमें बताता है कि CPU रजिस्टर से प्रोसेसर करने के लिए कितनी मेमोरी एक्सेस कर सकता है और इन प्रोसेसर के आधार पर ही 32-bit और 64-bit ऑपरेटिंग सिस्टम बनाए गए है।

32-bit प्रोसेसर

ये एक प्रकार का CPU आर्किटेक्चर है जो 32 बिट डेटा ट्रांसफर करने की क्षमता रखता है। ये डेटा और जानकारी की साइज को दर्शाता है जिसे CPU ऑपरेट करते समय आसानी से प्रोसेस कर सकता है। 2000 और 1990 के दशक की शुरुआत में ज्यादातर कंप्यूटर 32-bit की मशीन थे।

रजिस्टर में एक bit आमतौर पर एक सिंगल byte को दर्शाता है। इस प्रकार, 32-bit सिस्टम लगभग 294,967,296 bytes (4GB) RAM को सँभालने में सक्षम है। इसकी वास्तविक सीमा 3.5 GB (आमतौर पर) से कम होती है क्योंकि रजिस्टर का एक हिस्सा मेमोरी एड्रेस के अलावा कई दूसरे टेम्पररी वैल्यू को स्टोर करता है।

64-bit प्रोसेसर

64-bit माइक्रोप्रोसेसर कंप्यूटर सिस्टम को 64 bits में जानकारी, डेटा और मेमोरी एड्रेस को प्रोसेस करने की अनुमति देता है। ऐसी प्रणाली आमतौर पर 16 exabytes (17,179,869,184 GB), या 18,446,744,073,709,551,616 bytes मेमोरी को दर्शाती है।

64-bit सिस्टम (64-bit प्रोसेसर वाला कंप्यूटर) 4 GB से ज्यादा RAM एक्सेस कर सकता है। इसका मतलब है कि अगर किसी कंप्यूटर या लैपटॉप में 8GB RAM है, तो उसके लिए 64-बिट प्रोसेसर की आवश्यकता होगी। अन्यथा, CPU कम से कम 4GB मेमोरी तक एक्सेस कर पाएगा।

32-bit प्रोसेसर और 64-bit प्रोसेसर के बिच मुख्य अंतर

32-bit प्रोसेसर64-bit प्रोसेसर
32-bit OS और प्रोसेसर दोनों ही 64-bit से धीरे काम करते है।64-bit OS और प्रोसेसर दोनों ही 32-bit से ज्यादा फ़ास्ट काम करते है।
32-bit सिस्टम 32-bit OS और सॉफ्टवेयर को आसानी से चला सकते है लेकिन वो 64-bit OS और सॉफ्टवेयर को चलाने में शक्षम नहीं है।64-bit सिस्टम 64-bit OS और सॉफ्टवेयर को आसानी से चला सकते है साथ ही वो 32-bit के OS और सॉफ्टवेयर को चलाने में भी शक्षम है।
ये केवल 4GB तक की RAM को ही हैंडल कर सकते है।ये केवल 8GB की RAM या उससे ज्यादा को ही हैंडल कर सकते है।
32-bit सिस्टम में डुअल-कोर और quad-core वर्जन तक उपलब्ध हैं।64 बिट सिस्टम में dual-core, quad-core, six-core and eight-core वर्जन आते हैं। इसमें कई कोर के उपलब्ध होने से इसकी कैलकुलेशन की स्पीड प्रति सेकंड बढ़ जाती है।
32-bit पर मल्टीटास्किंग और हैवी एप्लीकेशन नहीं कर या चला सकते है।64-bit मल्टीटास्किंग और हैवी एप्लीकेशन के लिए बिलकुल सही है।
32-bit के लिए CPU 32-bit का होना चाहिए।64-bit के लिए CPU भी 64-bit का ही होना चाहिए।
विंडोज में इसे x84 के नाम से भी जाना जाता है।विंडोज में इसे x64 के नाम से भी जाना जाता है।

अभी सारे नए कंप्यूटर या लैपटॉप 64-bit प्रोसेसर और OS वाले ही आ रहे है, लेकिन फिर भी अगर आप नया सिस्टम खरीदते है तो एक बार दुकानदार से कन्फर्म जरूर करले।

ऑपरेटिंग सिस्टम में kernel क्या होता है?

Kernel ऑपरेटिंग सिस्टम का दिल होता है। Kernel ऑपरेटिंग सिस्टम का पहला प्रोग्राम होता है जो सिस्टम को ऑपरेट करने के लिए प्राइमरी मेमोरी में सबसे पहले लोड होता है। ये मैन मेमोरी के अंदर तब तक रहता है जब तक कि सिस्टम बंद नहीं हो जाता। kernel यूजर के ज़रिये दिए गए कमांड को मशीन के समझ में आने लायक भाषा में कन्वर्टता है।

Kernel सिस्टम के एप्लिकेशन सॉफ़्टवेयर और उसके हार्डवेयर के बीच एक ब्रिज का काम करता है। एप्लिकेशन या सॉफ़्टवेयर के द्वारा दिए गए रिक्यूएस्ट को हार्डवेयर तक पंहुचाने के लिए kernel हार्डवेयर से डायरेक्ट इंटरेक्ट करता है।ऑपरेटिंग सिस्टम kernel के बिना काम नहीं कर सकता, जो की सिस्टम के लिए एक इम्पोर्टेन्ट प्रोग्राम है।

अगर आसान भाषा में कहु तो जैसे आर्मी में कर्नल होता है जो फौज को कंट्रोल और कमांड देता है वैसे ही ये OS में भी Kernel काम कंट्रोल करना और कमांड कमांड देना होता है।

अब तक आप ये समझ ही गए होंगे कि OS के बिना कंप्यूटर सिस्टम किसी काम के नहीं है। बिना OS के ये एक खली डिब्बे के जैसा ही है। OS यूजर और हार्डवेयर की बिच इंटरफ़ेस का काम करता है। अगर आपके कंप्यूटर में OS इनस्टॉल नहीं है तो कीबोर्ड, माउस, मोडरबॉर्ड, BIOS, इत्यादि को ये पता ही नहीं चलेगा की उन्हें क्या काम करता है और कैसे। ना ही ये आपस में कम्यूनिकेट कर पाएंगे।

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Dharmendra Author on Web Janakari

मेरा नाम धर्मेंद्र मीणा है, मुझे तकनीक (कंप्यूटर, लैपटॉप, स्मार्टफोन्स, सॉफ्टवेयर, इंटरनेट, इत्यादि) से सम्बन्धी नया सीखा अच्छा लगता है। जो भी में सीखता हु वो मुझे दुसरो के साथ शेयर करना अच्छा लगता है। इस ब्लॉग को शुरू करने का मेरा मकसद जानकारी को ज्यादा से ज्यादा लोगो तक हिंदी में पहुंचना है।

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